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Saturday, 26 December 2009

We live in an advanced country

Who says that we are a developing nation and we have still a long way to go in terms of infrastructure development, providing clean safe drinking water to rural masses.

Forget these things and read today's newspaper, you will find an old senior politician leaving behind younger people by miles. Certainly, he is as advanced in this area, as a westerner would be.

He is prime example of what is said that a man becomes old only when he thinks himself old.

Hats off to Mr. N D Tewari. As luck would have it, he could have become prime minister of India. He is our desi Bill Clinton.

Thursday, 24 December 2009

फ्लाईओवर - Interesting read

निम्नलिखित लेख उस छात्र की कॉपी से लिया गया है, जिसे निबंध लेखन प्रतियोगिता में पहला
पुरस्कार मिला है। निबध का विषय था - फ्लाईओवर।

फ्लाईओवर का जीवन में बहुत महत्व है, खास तौर पर इंजीनियरों और ठेकेदारों के जीवन में तो घणा
ही महत्व है। एक फ्लाईओवर से न जाने कितनी कोठियां निकल आती हैं। पश्चिम जगत के इंजीनियर
भले ही इसे न समझें कि भारत में यह कमाल होता है कि पुल से कोठियां निकल आती हैं और
फ्लाईओवर से फा??्महाउस।

खैर, फ्लाईओवर से हमें जीवन के कई पाठ मिलते हैं, जैसे बंदा कई बार घुमावदार फ्लाईओवर पर चले,
तो पता चलता है कि जहां से शुरुआत की थी, वहीं पर पहुंच गए हैं। उदाहरण के लिए ऑल इंडिया
इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पास के फ्लाईओवर में बंदा कई बार जहां से शुरू करे, वहीं पहुंच
जाता है। वैसे, यह लाइफ का सत्य है, कई बार बरसों चलते -चलते यह पता चलता है कि कहीं पहुंचे
ही नहीं।

फ्लाईओवर जब नए-नए बनते हैं, तो एकाध महीने ट्रैफिक स्मूद रहता है, फिर वही हाल हो लेता है
। जैसे आश्रम में अब फ्लाईओवर पर जाम लगता है, यानी अब फ्लाईओवर पर फ्लाईओवर की जरूरत है।
फिर उस फ्लाईओवर के फ्लाईओवर के फ्लाईओवर पर भी फ्लाईओवर चाहिए होगा। हो सकता है कि
कुछ समय बाद फ्लाईओवर अथॉरिटी ऑ?? इंडिया ही बन जाए। इसमें कुछ और अफसरों की पोस्टिंग
का जुगाड़ हो जाएगा। तब हम कह सकेंगे कि फ्लाईओवरों का अफसरों के जीवन में भी घणा महत्व है।

दिल्ली में इन दिनों फ्लाईओवरों की धूम है। इधर से फ्लाईओवर, उधर से फ्लाईओवर। फ्लाईओवर बनने
के चक्कर में विकट जाम हो रहे हैं। दिल्ली गाजियाबाद अप्सरा बॉर्डर के जाम में फंसकर धैर्य और
संयम जैसे गुणों का विकास हो जाता है, ऑटोमैटिक। व्यग्र और उग्र लोगों का एक ट्रीटमेंट यह है
कि उन्हें अप्सरा बॉर्डर के जाम में छोड़ दिया जाए।

फ्लाईओवर बनने से पहले जाम फ्लाईओवर के नीचे लगते हैं, फिर फ्लाईओवर बनने के बाद जाम ऊपर
लगने शुरू हो जाते हैं। इससे हमें भौतिकी के उस नियम का पता चलता है कि कहीं कुछ नहीं बदलता,
फ्लाईओवर का उद्देश्य इतना भर रहता है कि वह जाम को नीचे से ऊपर की ओर ले आता है, ताकि
नीचे वाले जाम के लिए रास्ता प्रशस्त किया जा सके।

फ्लाईओवरों का भविष्य उज्जवल है। कुछ समय बाद यह सीन होगा कि जैसे डबल डेकर बस होती है,
वैसे डबल डेकर फ्लाईओवर भी होंगे। डबल ही क्यों, ट्रिपल, फाइव डेकर फ्लाईओवर भी हो सकते हैं।
दिल्ली वाले तब अपना एड्रेस यूं बताएंगे - आश्रम के पांचवें लेवल के फ्लाईओवर के ठीक सामने जो
फ्लैट पड़ता है, वो मेरा है। कभी जाम में फंस जाएं, तो कॉल कर देना, डोरी में टांग कर चाय
लटका दूंगा। संवाद कुछ इस तरह के होंगे - अबे कहां रहता है आजकल रोज अपने फ्लैट से पांचवें लेवल
का जाम देखता हूं, तेरी कार नहीं दिखती।



Note: Above matter is taken from an email.

Wednesday, 16 December 2009

India comes on top

India held her nerve register a win in a tense situation where they would have lost nine out of ten times. If I dare say, we have seen India losing from similar situations where Sri Lanka were in. But, this has been a refreshing change in the approach where they managed to stay in. Ironically, we will not often find figures of 88 and 81 of 10 overs treated with respect,but Zaheer Khan and Ashish Nehra have just managed that.
With 9 wickets in hand, Srilanka were the favourites with about 15 overs remaining and 100 runs required, but when it mattered, India held there nerve and came out as winners. Not too long ago, we have seen India losing from a confortable position where Tendulkar wrote an epic when he made 175. We have lost from a winning position, but today, we have managed to pull it off and as they say, it would be apt to say that we snatched victory from jaws of defeat.
I just hope that we continue to retain this spirit of never say die, because we do not lack in skill, but attitude.

Friday, 28 August 2009

Bahut dinon ke baad

Its been long since I have written something here.  Reason is not that I have lost interest, but it has to do more with the fact that I am moving back to India. My assignment is coming to an end and last few weeks have been very busy, completing assignments, making arrangements, throwing items which are of no use and lastly, worrying about the baggage allowance. 


It may take about an month when I return to blogging, since I will be visiting my home, which is in Patna, a town near Ganga Kinaare. And then the problem of getting a reliable internet connection. 


Thanks to all of you, who are reading my posts. Till next time, tada.

Monday, 17 August 2009

चहबच्चा

नेतरहाट के किसी भी छात्र से अगर आप "चहबच्चा" शब्द की चर्चा करें तो सम्भावना है की आप उस छात्र के चेहरे पे मुस्कान पायें। तो आयें हम यह जानने की कोशिश करें की ऐसा क्या है इस शब्द में जिसे सुन कर एक व्यक्ति बेसाख्ता ही मुस्कुरा पड़े।
चहबच्चा एक आयताकार गढ्ढा होता है जो चापानल के पास में हुआ करता है। यहाँ पे चापाकल के निकला हुआ इस्तेमाल के बाद का गन्दा पानी जमा होता है। एक साधारण सा गढ्ढा , जो गन्दा पानी जमा करने के काम आता है , में ऐसा क्या है जो एक पोस्ट का शीर्षक है ? धीरज रखें महानुभाव।

यह साधारण सा चहबच्चा होली के आस पास बहुत महत्त्वपूर्ण स्थल बन जाता है। होली के पहले विशेष ध्यान देकर इसकी सफाई की जाती है और खासकर ध्यान दिया जाता है की शीशा और धातु इत्यादि की वस्तुएं इसमें न रहे। इस सफाई के बाद इस चहबच्चे में छात्र एक दूसरे को डुबोते हैं। उस बालक को ज्यादा डुबाया जाता है जो ज्यादा मना करता है। और इस डुबाने की क्रिया एक विशेष अंदाज़ में की जाती है।

चार छात्र उस छात्र को जिसे डूबाना है, उसे पकड़ लेते हैं, दो हाथ और दो पैर, फिर एक झूले की तरह उसे तीन बार दायें से बाएँ और बाएँ से दायें ले जाकर छोड़ा जाता है और बेचारा बालक पानी में सरोबार हो जाता है। फिर अगले बालक को चहबच्चे में डालने के लिए एक और स्वयंसेवक मिल जाता है।

हाँ, डूबाना शब्द का उपयोग करने से एक बात याद आई। नेतरहाट के सन्दर्भ में डूबाना एक विशेष क्रिया है, जो आपको फिर कभी बताई जायेगी।

Saturday, 15 August 2009

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ


चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ

चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ

मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक

- माखनलाल चतुर्वेदी
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जो भरा नही है भावों से

जो भरा नही है भावों से
जिसमें बहती रस धार नहीं
वो हृदय नहीं हाँ पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।